वैदेही अब धाम पधारो
हृदय पटल की पीड़ा हर लो सूने कक्ष संवारो
कौशल्या की बुझी है आशा
व्याकुल है सरयू की भाषा
नगर जनों को घोर निराशा
मौन तपस्या को तज कर अब आकर पार उतारो
कंटक पथ पर कोमल काया
तपती धूप न कोई छाया
देख व्यथा यह मन भर आया
वन के उजड़े सूनेपन से बाहर पग अब धारो
नृप के कठिन नियम सब माने
मैंने निज कर्तव्य पहचाने
पर अब व्याकुल प्राण ये जाने
राज मुकुट की अग्नि शांत कर शीतल नेह दुलारो
शून्य हुआ है अवध का आँगन
रोता है प्राणों का स्पंदन
सुन लो मेरे मन का क्रंदन
निज चरणों की पावन रज से धरती आज निखारो
सूने हैं सब राज महल ये
काटे नहीं कटते हैं पल ये
अश्रु बहाते हैं जल थल ये
अंतर्मन की इस ज्वाला को आकर आज निवारो
छाई है घनघोर उदासी
रोती है यह नगरी प्यासी
व्याकुल है हर अवध निवासी
राजधर्म के इस बंधन से मुझको आज उबारो
सूखी है सरयू की जल धार
तज बैठी नगरी शृंगार
रोता है अब सकल परिवार
आकुल मेरे इन प्राणों को आकर आज पुकारो
सूने हैं सब राज द्वारे
गिनता हूँ मैं नभ के तारे
हम दोनों हैं विधि के हारे
वीरान हुए इस जीवन में फिर से प्राण संचारो
वैदेही अब धाम पधारो
हृदय पटल की पीड़ा हर लो सूने कक्ष संवारो
-भानु शर्मा रंज
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
कमेंट
कमेंट X