पीड़ा का ऐसा राग जगा
जो मिलन सुधा सा मीठा हो
मेरी सुध बुध ऐसे खो जाए
जैसे जल में रँग डीठा हो
मैं अश्क बनूँ तो तू ढलके
मैं मौन रहूँ तू बोल उठे
मेरे सूनेपन की सीपी में
तू स्वाति बूँद सा डोल उठे
तू प्रेम का ऐसा ज्वार उठा
मेरा रोम रोम रस धार बने
मैं मिट जाऊँ जिस चौखट पर
वह चौखट मेरा प्यार बने
जब कुंतल तेरे लहराएँ
सावन की घटा लजा जाए
तू नैन मिलाए तो जैसे
तीरथ का पुण्य समा जाए
मैं छुऊँ तुझे तो उँगलियाँ
कर्पूर सरीखी महक उठें
तेरे अधरों की कंपन से
मेरी वीणाएँ चहक उठें
इतनी दे दे एकाग्रता मुझे
कि देह नहीं बस सार दिखे
तू प्रेम का ऐसा ज्वार उठा
मेरा रोम रोम रस धार बने
जब दूर क्षितिज पर जाए तू
मैं परछाईं बन रुक जाऊँ
तेरी यादों की आँधी में
मैं दीप सरीखा झुक जाऊँ
वह विरह न हो तपस्या हो
जिसमें कुंदन सा दमकूँ मैं
तू रहे गगन का चाँद कहीं
तेरी चाँदनी बन चमकूँ मैं
इन खाली खाली रातों में
तेरी स्मृतियों का संसार सजे
तू प्रेम का ऐसा ज्वार उठा
मेरा रोम रोम रस धार बने
कोई भेद रहे ना तुझमें मुझमें
मैं मैं ना रहूँ बस तू हो जा
कण कण में तेरा अक्स खिले
हर दिशा तेरी ही सू हो जा
मेरा जीवन तेरी आरती हो
मेरी मृत्यु तेरा ही आँगन हो
जिस मिट्टी में ये देह मिले
वह मिट्टी तेरा चंदन हो
कल रंज कहे दुनिया जिसको
वह तेरे सुर की झंकार सुने
तू प्रेम का ऐसा ज्वार उठा
मेरा रोम रोम रस धार बने
-भानु शर्मा रंज
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