गीत
जब उम्मीद का भाल झुकने लगे
तुम्हें अपना साया भी छलने लगे
तभी तुम मेरी सम्त मुड़ना ज़रा
वफ़ाओं का ख़ेमा गढ़ा ही मिलेगा
तेरी आस में!
नयी मंज़िलों की अभी चाह है
सुनहरी सी लगती हर इक राह है
अभी हौसलों के नए पंख हैं
दिशाओं में बजते विजय-शंख हैं
मगर जब ये परवाज़ थकने लगे
ये नभ का ग़ुरूर भी पिघलने लगे
तभी तुम मेरी सम्त मुड़ना ज़रा
वो बरगद का साया तना ही मिलेगा
तेरी आस में!
जब उम्मीद का भाल झुकने लगे
मरीचिका को तुमने समंदर कहा
बबूलों की छाँव को अपना घर कहा
कनक-मृग की ख़ातिर लुटाई है जान
कि दाँव पे रख दी है ख़ुद की पहचान
भ्रम का अँधेरा जो डसने लगे
स्वयं का ही अक्स जब हँसने लगे
तभी तुम मेरी सम्त मुड़ना ज़रा
प्रतीक्षा का आँगन सजा ही मिलेगा
तेरी आस में!
जब उम्मीद का भाल झुकने लगे
तुम्हें अपना साया भी छलने लगे
-भानु शर्मा रंज
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