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रूप सुधा की गगरिया

                
                                                         
                            गीत - रूप सुधा की गगरिया
                                                                 
                            

मुख पर दमकै बाल-दिवाकर
केश सघन ज्यों सावन-छाया
कंचन सी यह देह दमकती
स्वयं रती ने गढ़ी हो माया
ऐसो रूप धरयो हे सजनी
भँवरा बन गयो साजन तोरा

मृगछौनी से चपल नयन में
मदिरा सी छलकै है धार
मादक सी इस चितवन पर मैं
वारूँ अपना सब संसार
लचकै कटि ज्यों नव-पल्लव सी
पग-पग बाजैं रुनझुन पायल
मत्त-हंसिनी सी गति तोरी
देखत ही मन होय है घायल

ऐसो रूप धरयो हे सजनी
भँवरा बन गयो साजन तोरा


अधर बिम्ब ज्यों अरुण-कमल दल
बोली कोयल सी मदमाती
हास तुम्हारा पारिजात सा
झरैं फूल ज्यों रितु मुस्काती
ग्रीवा शंख-समान सलोनी
भुज-वल्लरि कंदर्प की डोरी
रोम-रोम में भरयौ है तेरे
चंदन जैसी गंध किशोरी

ऐसो रूप धरयो हे सजनी
भँवरा बन गयो साजन तोरा


जहँ-जहँ तू पग धरे बावरी
तीरथ बन जावै वह ठाँव
तेरे रूप की धूप सेंक कर
तपते मन को मिल गई छाँव
रूप-सुधा की भरी गगरिया
कंचन घट सी देह-तरंग
छलक-छलक पड़तौ है जोबन
भीग रह्यौ मेरो मन-रंग

ऐसो रूप धरयो हे सजनी
भँवरा बन गयो साजन तोरा


नैनन में बस गई मूरति
औ' साँसों में तेरी सुवास
तू ही मेरी प्रेम-तपस्या
तू ही जनम-जनम की प्यास
रंग रूप का यह मधु-उत्सव
युग-युग तक गावैं सब मीत
काव्य बनै वह मिलन-कथा जो
अमर रहै यह पावन प्रीत

ऐसो रूप धरयो हे सजनी
भँवरा बन गयो साजन तोरा
-भानु शर्मा रंज
 
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2 महीने पहले

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