एक प्राण देह दोउ, अकथ अभेद जुत
तत्व गुह्य गोप्य महा, प्रेमरस कंद हैं
नित्य रास रासेश्वरी, कृपा-सिंधु स्वामिनी जु
पाप ताप हारिणी सु, छिन्न भव फंद हैं
ब्रह्म हु डरत जासो, काल हु कंपत त्रास
तेई वृज बाला संग, खेलत स्वच्छंद हैं
श्वास-श्वास राधा नाम, जपत अखंड श्याम
'रंज' कवि गावत जु, मिटत सुद्वंद हैं
करुणा कदंब घन, कृपा पारावार महा
शेष औ महेश मुनि, पावत न पार हैं
माधुरी मरंद सिंधु, श्रीकिशोरी जू की छटा
रूप माधुरी की निधि, सुधारस धार हैं
आगम निगम थके, खोजत अनंत काल
राधा नाम महा मंत्र, वेदहु को सार हैं
नीलमणि श्याम प्रभु, त्रिभुवन नाथ तऊ
'रंज' राधा चरननि, उर के शृंगार हैं
द्युति दामिनी सी देह, कांति कंबु कंठ राजै
त्रिकुटी के मध्य जैसें, ध्यान को वितान है
साँवरे के नैनन में, अंजन सी आंजि रही
चित्त की चितेरी वाम, मोहिनी महान है
स्पर्श के समीर मात्र, रोम रोम कुंज बनै
दृष्टि के विलास माहिं, सिमट्यौ जहान है
स्याम निज तन माहिं, श्यामा-छबि जोहत हैं
राधिका विलोकत सु, रूप भगवान है
बिंदु विच नाद जैसें, नाद विच सुन्न जैसें
सुन्न विच ज्योति जैसें, उलझी सु डोर है
श्याम में सिमटि श्यामा, श्यामा विच श्याम घन
ब्रह्मांड को छांड़ि ध्यान, लाग्यौ इक ओर है
कृपा को पर्वत जैसें, करुणा को वारिधि जु
थाह न लहंत कोउ, बाढ्यौ चहुँ ओर है
ब्रह्म जो अनंत पार, जाको न लहंत सार
सोऊ नटवर आज, नाचत ज्यों मोर है
अक्षर अतीत तत्त्व, ह्लादिनी अचिन्त्य सक्ति
कीर्ति कुक्षि कौमुदी जु, त्रैलोक्य उजारी है
नित्य रास रासेश्वरी, चिन्मय चिदानंद सु
मोहन विमोहिनी जु, अद्भुत विहारी है
कोटि कमला विलास, करुना कदंब वास
स्याम हुँ कृपा के कांक्षी, भक्तन हितारी है
राधा रास रागिनी जु, रागती विरागती सु
अनुराग रंजिनी जु, रंज अघहारी है
श्रुति सिरमौर तत्त्व, वैखरी पश्यंती पारा
नाद बिंदु के अतीत, ऐसी मूल राधा है
कैवल्य को तुच्छ करि, करुना पीयूष भरि
भक्त के अधीन नत, प्रेम पथ साधा है
रस मकरंद पान, मधुप मुकुंद मन
गुंजत विमुग्ध तहाँ, पावत समाधा है
रंज कवि रंजित जु, भव भय भंजित सु
किशोरी कटाक्ष लखि, मिटत उपाधा है
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