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चंदन सी सघन फुहार

                
                                                         
                            घिरि घिरि आवत सावन बदरा नैनन बरसत नीर अचेत
                                                                 
                            
पिय बिनु सूनी भई डगरिया कौन करै अब मन सों हेत
घन गरजत ज्यों बिरह नगारा कसकत दामिनि हिय के पार
मैं बिरहनि चातक सी प्यासी तुम चंदन सी सघन फुहार

सघन कुंज भींजत बेलरिया दादुर मोर पपीहा बोलैं
सीत पुरवैया डसत नागिन सी बिरह हलाहल नस नस घोलैं
बाहर भींजत चीर चुनरिया भीतर तपत अगनि की धार
मैं बिरहनि चातक सी प्यासी तुम चंदन सी सघन फुहार

तुम हो दरस सुधा के सागर मैं मरुथल सी तड़पत नारी
तुम मधुबन के नवल विहारी मैं पथ जोहत भई दुखारी
काजल रेख बही अंसुवन सँग नैनन ढूँढत नेह कछार
मैं बिरहनि चातक सी प्यासी तुम चंदन सी सघन फुहार

बिछुरन को यह जोग महा दुख पल पल बीतत है जुग जैसो
सपनन में जो हाथ छुड़ाए निठुर सनेह लगायो कैसो
रंज दरस बिनु प्रान तड़पत हैं तुम जीवन मैं विरह पुकार
मैं बिरहनि चातक सी प्यासी तुम चंदन सी सघन फुहार
-भानु शर्मा रंज
 
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2 महीने पहले

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