आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

भावों से शृंगार करो तुम

                
                                                         
                            काल-गरल की कड़वाहट में,
                                                                 
                            
अमृत-कलश मथने से पहले,
अंतस के सूखे उपवन का,
भावों से शृंगार करो तुम!

मृगतृष्णा के स्वर्ण-मृगों पर,
भ्रम के बाण चलाना छोड़ो,
सतरंगी इन माया-जालों,
से अब मोह हटाना सीखो।
नभ-चुम्बी अट्टालिकाएँ,
झूठा दम्भ भर रही हैं जब,
नींव के उस एकाकी पत्थर,
का तो कुछ सत्कार करो तुम!

अक्षर-अक्षर ज्ञान बाँचकर,
पंडित तो बन गए जगत में,
किंतु हृदय की कोरी पोथी,
बाँच न पाए तुम मतिभ्रम में।
शब्द-जाल के कोलाहलों में,
मौन की वीणा जब भी बाजे,
अंतरात्मा के उस स्वर का,
श्रद्धा से स्वीकार करो तुम!

कालचक्र के क्रूर भाल पर,
विजय-तिलक यदि अंकित करना,
तो विपदा के तूफानों में,
सीखो तुम अडिग विचरना।
प्रतिकूलताओं के शिखरों पर,
धैर्य का सूरज जब भी चमके,
उस स्वर्णिम आभा से अपने,
तेज का अब विस्तार करो तुम!

साँसों की बंजर धरती पर,
नेह की बदली जब भी बरसे,
जीवन के इस महाकाव्य में,
छंद नए रचने को तरसे।
पीड़ा के इन खारे जल से,
धोकर मन के सारे कलुष,
अन्तर्दृष्टि जगाकर अपनी,
सत्य का साक्षात्कार करो तुम
-भानु शर्मा रंज

 
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
5 घंटे पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर