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अर्थ कहाँ मिटा है बोलो

                
                                                         
                            पल पल दृश्य बदलते रहते
                                                                 
                            
नदियों जैसे बहते रहते
कुछ लफ़्ज़ों के खो जाने से
अर्थ कहाँ मिटा है बोलो

दृश्य नया क्या बस इक झरोखा
किरणों का सुनहरा धोखा
और गुज़रना उसका जैसे
हवा का एक अल्हड़ झोंका
नये शिखर को छूने वाले
नित्य नये पथ बुनने वाले
एक दिशा के खो जाने से
सफ़र कहाँ रुका है बोलो

भोर यदि मुख मोड़ गई तो
ऋतु नयी आहट दे देगी
गर पतझड़ ने पत्ते लूटे
कोंपल नयी जगह ले लेगी
कल की याद मनाने वाले
बीते पल को रोने वाले
एक भँवर के आ जाने से
प्रवाह कहाँ रुका है बोलो

खोटा कहाँ कुछ इस जग में
केवल दृश्य बदल जाते हैं
जैसे मेघ हटा कर अम्बर
नये सितारे चमकाते हैं
नयी धरा पर चलने वाले
नये स्थान को चुनने वाले
कुछ थकानों के बढ़ जाने से
चरण कहाँ थका है बोलो

कितनी ही आँधियाँ उठी हों
पर्वत का विश्वास न टूटा
कितनी बार ऋतु रंग बदले
धरती का श्रृंगार न छूटा
बदलावों से डरने वाले
ठहरावों पर मरने वाले
कुछ छायाओं के ढल जाने से
प्रकाश कहाँ मिटा है बोलो

चाहे घिरे निराशा के घन
छुप न सकीं उम्मीद की किरणें
राहें गर कुछ पथरीली हों
रुके कहाँ पर्वत के झरने
कल की चिंता करने वाले
अकारण ही डरने वाले
कुछ युगों के बीत जाने से
समय कहाँ थमा है बोलो

-भानु शर्मा रंज
 
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एक महीने पहले

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