किस अँधेरे में भटकता जा रहा है आदमी,
दर्द को ग़ज़लों की भाँति गा रहा है आदमी।
सरहदें हैं हर तरफ़ फिर भी लगा रहता है डर
क्योंकि अपनों से ही चोटें खा रहा है आदमी।
सच की ख़ातिर कौन अब तहक़ीक़ करने जाएगा,
झूठ के बाज़ार में बिकता रहा है आदमी।
फूल जैसे ख़्वाब सारे रौंद डाले वक़्त ने,
रोज़ अपने आप को भरमा रहा है आदमी।
देख करके अक्स ख़ुद का खुद ही डर जाता है अब
घूँट अवसादों का नित पीता रहा है आदमी?
ज़ख्म सीने के छुपा कर मुस्कुराता है मगर,
ये तो तुम भी जानते हो क्या रहा है आदमी।
ज़िंदगी के जंग में अपना ही 'कौशल' हार के
साँस लेने के लिए पगला रहा है आदमी।
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