पर्वत से नीचे है
पाँव पसारती
अराजकता
यत्र-तत्र ही नहीं
सर्वत्र
पक्ष से विपक्ष तक
दास (ब्यूरोक्रेट्स) से आंदोलनकारी तक
और प्रजा
भयाक्रांत है
देख और भोग कर राजदण्ड
राजप्रासाद से गूँजती प्रतिध्वनि-
"परित्राणाय दुष्कृताम"
"विनाशाय च साधूनाम्"
हो रहा तुमुल
राजा
बजा रहा है तबला
और कबीलों के लोग
ध्वजा को शिखंडी बना
कर रहे हैं
नित नव आक्रमण।
निष्क्रिय सा प्रतीत होता राजा
निष्क्रिय नहीं
बहुत व्यस्त है
असुरों के स्वागत में।
हर कबीले का एक ही लक्ष्य है
"राजसिंहासन"
कैसे भी
छल-युद्ध करके
या विश्वासघात करके।
तिलचट्टे
सचमुच तिलचट्टे हैं
सर्वभक्षी
तीव्रगमन
छिपने में दक्ष
और
प्रतिकूल स्थिति में भी
अद्भुत जिजीविषा,
तुम खोजते रहो
न्यायालय में न्याय
जो वहाँ
कभी नहीं मिलता,
तिलचट्टे कहाँ नहीं हैं!
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