आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

प्रेम के उपक्रम

                
                                                         
                            मैं मरा,
                                                                 
                            
किंतु तब - तब नहीं जब मैं प्रेम में था।

प्रेम में पड़े लोग मरते नहीं
मार भले दिए जाते हों।

एक पेड़ धरती के प्रेम में जब तक होता है
उस पर फल आते हैं
उसके साये में मुसाफ़िर पनाह पाते हैं
उसके डालियों पर पंछी घोंसला बनाते हैं।

एक नदी जब तक अपने किनारे रहने वाले लोगों के सहारे बहती है
उसके पास संस्कृति विकसित होती है
तीर्थयात्री उसमें नहाने आते हैं
उसमें मछलियाँ तैरती हैं।

एक नेता जब तक जनता को अपना मानता है
लोग उसे देवता के रूप में पूजते हैं
उसकी मूरत बनाते हैं
उसके साथ क़दम से क़दम मिला कर चलते हैं।

ये सारा उपक्रम प्रेम में होता है
प्रेम न रहे तो जीवन जीवन नहीं
मरण मरण नहीं।

जो भी अस्तित्वगत है
वह प्रेम की वज़ह से है।
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
2 महीने पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर