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गर आसमाँ मिले कभी

                
                                                         
                            गर आसमाँ मिले कभी
                                                                 
                            
तो आसमाँ से बोल दूँ
नहीं ललक परमार्थ की
ना चाहा कोई स्वार्थ ही

बस कर तू इतना गर करें
सिहरन के इस दौर में
सनसनी के जोर में
कोई ख्वाईशें जगा
कुछ बंदिशें मिटा
जिन पर लुप्त हो फिर
मलिन वो सारी धारणाएँ
जीवन की वो विडंबनाएं
जंहा फिर ना थोपा प्रधात हो
ना कायराना आघात हो
प्रेम विमर्श ही साथ हो
लिए भाग्यविधाता माथ हो
निकलना पड़े तो फिर
उस खोह को कर निरस्त
नवभोर का मार्ग हो प्रशस्त
बेझिझक मैं ये मोल दूँ
आसमाँ को नई आशाओं में तोल दूँ

गर आसमाँ मिले कभी
तो आसमाँ से बोल दूँ
नहीं ललक परमार्थ की
ना चाहा कोई स्वार्थ ही
-कमलेश रंजन
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एक महीने पहले

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