ख़ुद से ख़ुद को छिपाते हैं।
होंठों पर पड़ी हँसी को खींचकर
टूट जाते हैं
फिर सहेज लेते हैं
आँखें खोई है पर
लगातार ढूँढ़ते हैं जिसे
मिलने पर भूल जाते हैं
भूलते ही शून्य पसर जाता है
गैरज़रूरी चीज़े हैं सब
तब तक, जब तक
जो जिसे जहॉं ढूँढ रहा है
उसके टूकड़े उसे मिल नहीं जाते हैं
एक सिरा इधर तो एक है उधर
है लंबी दूरी
दोनों को एक साथ पकड़ नहीं पाते हैं
उड़ती हुई रेत में उभरी ख़ूबसूरती हैं
हाथ लगाते ही चेहरे से झर जाते हैं।
- कामिनी मोहन पाण्डेय
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