आशिक हूॅं मगर दिल ये तलबगार नहीं है ।
कहता है कौन हमको अजी प्यार नहीं है ।
देखेंगे तुझे रोज फिर भी उफ़ न करेंगे ।
पाने को तुझे दिल अभी तैयार नहीं है ।
माना कि बहारों ने खूब हल्ला किया है ।
हमको अभी मरना अजी स्वीकार नहीं है।
तन्हा हैं "कमल" पंगा किसी से भी नहीं है ।
यह दिल का अजी इश्क़ है व्यापार नहीं है ।
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
कमेंट
कमेंट X