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सूखी शाख़

                
                                                         
                            सूखी शाख़ पर बैठा एक पँछी सोच रहा था।
                                                                 
                            
बीते लम्हों की यादों में चुपचाप खो रहा था।
हर बार इसने दी थी छाँव, धूप से मुझे बचाया था।
आँधियों, बारिश और तपिश में अपना आँचल फैलाया था।
आज न पत्ते, न हरियाली—फिर भी इसका मान करूँ।
जिसने जीवन भर निभाया, आज उसे कैसे छोड़ चलूँ?
सुख के साथी बहुतेरे मिलेंगे, दुख में साथ वही अपना।
उपकारों का मोल समझना—यही है जीवन का सच्चा सपना।
आज सूखा है तो क्या हुआ, इसका ऋण मैं भूल न पाऊँगा।
जब तक साँसें साथ रहेंगी मेरी, इस डाली पर लौट आऊँगा।
— कमल किशोर झा 
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2 महीने पहले

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