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कभी सुख की छाया के पीछे भागा, कभी माया के आकर्षण में जागा।

                
                                                         
                            मृगतृष्णा से व्याकुल हो गया हूँ,
                                                                 
                            
अपनी ही चाह में खो गया हूँ।
मारीच-सा स्वर्ण मृग बन बैठा हूँ,
अपने ही छल में उलझ गया हूँ।

कभी सुख की छाया के पीछे भागा,
कभी माया के आकर्षण में जागा।
जितना पाया, प्यास बढ़ती गई,
मन की बेचैनी और गहराती गई।

कोई राम को बाण लेकर बुलाओ,
इस स्वर्णिम छल का अंत कराओ।
मोह के इस आवरण को चीर दो,
मुक्ति का कोई मार्ग प्रशस्त कर दो।
— कमल किशोर झा 
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एक दिन पहले

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