मुकाम को मुकम्मल करने के लिए जिस नींव का पत्थर हमने ढाला है,
ये मुकाम तेरे ताज को सजाने के लिए मैंने इस नींव में क्या-क्या न ढाला है।
ज़माने ने सिर्फ चमकती हुई इमारत देखी है मेरी कामयाबी की,
मगर इस बुलंद मीनार को खड़ा करने में, मैंने खुद को कितना संभाला है।
जीवन की जवानी लुटा दी, हंसती-खेलती वो बहारें छोड़ दीं,
रात-दिन के इस कड़े इम्तिहान में, जिंदगी का सुकून छोड़ दिया।
वो घर की ठंडी छांव, वो अपनों की महफिलें, वो बेफिक्री के दिन,
मंज़िल के जुनून में मैंने अपनी हर ख्वाहिश का खून छोड़ दिया।
तरसती रही आँखें जिनकी एक झलक को देखने के वास्ते,
उस मुकाम की खातिर, माता-पिता का वो प्यारा प्रेम छोड़ दिया।
उनके आंसुओं को अपनी आँखों में समेट कर आगे बढ़ा हूँ मैं,
जिन्होंने चलना सिखाया, उन्हीं का वो मुकद्दस (पवित्र) सहन छोड़ दिया।
और क्या कहा है कि...
तेरे लिए इस चेहरे की सुंदर रौनक, ये खिली हुई मुस्कान नाम कर दी,
रात की नीदों से बगावत करके, आँखों की वो मासूम सी पहचान नाम कर दी।
दिल की धड़कनों का वो नाज़ुक सा तार, जो कभी अपनों के लिए धड़कता था,
मंज़िल की अंधी दौड़ में, वो आवाज़ भी पूरी तरह से गुमनाम कर दी।
लोग देखते हैं जब सर पर मेरे सफ़लता का ये चमचमाता हुआ सेहरा,
उन्हें क्या पता कि इस जीत के पीछे, हार का कितना गहरा साया है।
ज़ख्मों को छुपाकर महफ़िल में मुस्कुराना सीखा है मैंने,
तब जाकर इस वीरान जिंदगी ने, इस ऊंचे मर्तबे (ओहदे) को पाया है।
मत पूछ कि ऐ मुकाम! तेरे इस आलीशान और चमचमाते ताज के लिए,
मैंने हँसते-हँसते इस भरी दुनिया में, अपना क्या-क्या नहीं छोड़ दिया।
एक तुझे पाने की ज़िद में, ऐ मेरी आखिरी मंज़िल,
मैंने अपनी ही रूह का, हर एक कोना मरोड़ दिया!
-कालू राम सैनी
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