उसे वक्त में बस एक ही शख्स था ,
मां का नाम मेरे हर लफ्ज़ में था।
मेरा हर जख्म उसका जख्म था,
वो साया मेरा हर मरहम था।
कुदरत का लाख शुक्रिया होता,
गर मेरी माँ को अमर कर दिया होता।
अकेला न होता इन बफाओं में,
अकेला न रहता इन अंधेरी राहों में।
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
कमेंट
कमेंट X