माँ की पुरानी साड़ी
माँ की वो पुरानी साड़ी, सिर्फ एक कपड़ा नहीं,
उसमें सिमटी ममता का अनमोल एहसास थी।
सुबह से लेकर ढलती रात तक,
हर पल वो साड़ी मेरे सबसे पास थी।
कभी मेरे चेहरे के आँसू और पसीना पोंछ जाती,
तो कभी उसी साड़ी के आँचल में लिपटकर,
माँ छोटी बहन को पैरों पर लेटाती,
और बड़े प्यार से तेल की मालिश लगाती।
वक़्त बदला, तो वो साड़ी मचान की शोभा बन गई,
बक्से और डिब्बों के ऊपर एक ढाल बन कर तन गई।
अंदर क्या सामान था, वो तो नहीं दिखता था,
पर उस पुरानी साड़ी को देख, मेरी आँखों में यादों का सावन उमड़ता था।
फिर एक दिन... वक़्त का ऐसा थपेड़ा आया,
पलायन के सफर में, घर और मचान पीछे छूट गया।
माँ की वो साड़ी भी उसी सूने मकान में रह गई,
आज भी बहुत याद आती है, माँ की वो पुरानी साड़ी।
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