क्यूँ पूछ रहे किस हाल में हूँ।
क्या नहीं पता, बेहाल में हूँ।।
तुम बने हुए अंजान हो जैसे,,,
दिन मौज भरे ननिहाल में हूँ।।
ये तेरा ही किया धरा है,,,
जो फंसा हुआ जंजाल में हूँ।
ऐ खुदा जरा सा लगा किनारा,,,
कही भटक रहा भोपाल में हूँ।
राह दिखा,,,,मेरे महाकाल तू,,,,
क्या करूँ भला, ये खयाल में हूँ।
क्या पूछ रहे? "जय" ग़म बतलाओ,,,,
बता दिया न, तंगहाल में हूँ।
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
कमेंट
कमेंट X