अंधेरी रात, मैं अकेली,
बिजली थी गुल ।
सामने चमकती दो आँखें,
आँखें फैलाकर देखा ।
उन चमकती आँखों का आगमन,
पीछे-पीछे रखे कदम,
धक-धक करता मेरा दम,
हारे मन से ज़मीन पर बैठी।
आह! छलाँग करती वो आँखें,
आ बैठी मेरी गोदी में ।
कराहती रही कि जकड़ लिया,
मुझे किसी आत्मा ने ।
पर वो थी मेरी प्यारी बिल्ली की आत्मा,
जो दौड़ी आई थी देने मेरा साथ।
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