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साँस बाकी है तो, सफर खत्म नहीं होता॥

                
                                                         
                            पति/पत्नी के जाने से, जीवन खत्म नहीं होता,
                                                                 
                            
साँस बाकी है तो, सफर खत्म नहीं होता॥

फिर क्यों समाज ने, एक शब्द में बाँध दिया,
जीते-जागते जीवन को, लेबल में जकड़ दिया॥

कह दिया विधवा उसे, कह दिया विधुर उसे,
शुभ से दूर कर दिया, अपशकुन कह कर उसे॥

मैं पूछता हूँ समाज से, ये कैसा न्याय है,
जिसने चोट खाई, उसी पर अन्याय है॥

अरे जिसने जीवन की, सबसे बड़ी चोट सही,
टूट कर भी जिसने, जीवन की ज्योत नहीं खोई॥

आँसू पीकर भी जो, फिर से मुस्कुराएं है,
गिर कर भी जो, फिर खुद ही संभल आएं है॥

वो विधवा नहीं, वो तो 'साध्वी' कहलाए,
वो विधुर भी नहीं, वो तो 'साधु' कहलाए॥

साधना है जीना भी, टूटने के बाद भी,
छूटने के बाद भी, रूठने के बाद भी॥

ये कविता उन सबके लिए, जिन्हें कहा गया निभाओ,
जीने की मत सोचो, बस रस्में निभाओ॥

मैं कहता हूँ उनसे, मरने से पहले जीना सीखो,
बिखरने से पहले, खुद को सींचना सीखो॥

जीवन किसी के जाने से, कभी रुकता नहीं,
दीया बुझ जाने से, घर झुकता नहीं॥

तो आओ प्रण लें हम, शब्द नहीं सोच बदलेंगे,
साध्वी और साधु कह कर, उन्हें गले से लगा लेंगे॥
- जगदीश प्रसाद शर्मा
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
5 दिन पहले

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