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मुझे अपना बना, अपने में मिला दे,

                
                                                         
                            "तेरी गोद का सुख"
                                                                 
                            

परमात्मा, सुना है बहुत गहरा है,
तेरी गोद का सुख काल से परा है।
उपमा से परे, शब्दों से परे है,
हर तर्क, हर सीमा से परे है।

वो सुख नहीं जो पल में ढल जाए,
वो अमृत-वर्षा है जो मन को भिगो जाए।
जिसमें भीग कर चेतना निर्मल होती है,
जन्म-जन्म के तापों को भूल सोती है।

हे अनन्त करुणा के सिन्धु महान,
सुन ले तू मेरे मन का आह्वान।
हमें भी उस वर्षा में भीगने दे,
आनन्द-धारा में जीने दे।

विषय-सुखों से अब तो उपराम कर,
आत्म-रति में हमें प्रतिष्ठित कर।
क्षुद्र में नहीं, पूर्ण में रमा दे,
खण्ड में नहीं, अखण्ड में जगा दे।

ये दुनिया तो मृग-तृष्णा सारी है,
हर प्यास यहाँ तो बेचारी है।
जल समझा जिसे, वो रेत निकली,
हर इच्छा यहाँ अधूरी निकली।

अब और न भटका, अब तो थाम ले,
गिरता हूँ प्रभु, गोद में थाम ले।
तेरा वात्सल्य ही एकमात्र शरण है,
तेरी गोद ही एकमात्र विश्राम है।

तू ही सत्य है, तू ही नित्य है,
तू ही शाश्वत, तू ही परमधाम है।
तेरे सिवा कुछ और नहीं है,
तू ही तू है, तू ही तू है...

मुझे अपना बना, अपने में मिला दे,
मैं बूँद हूँ, सागर में मिला दे।

- जगदीश प्रसाद शर्मा
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
11 घंटे पहले

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