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संध्या की प्रार्थना

                
                                                         
                            पहले जो सह लेते थे, वो अपने थे मेरे,
                                                                 
                            
मेरा गुस्सा पीकर भी, मुस्काते थे चेहरे।
अब वो चेहरे नहीं रहे, जो समझते थे मुझे,
समय बदल गया है, अब कोई सहता नहीं मुझे।

आज जुबां से जो भी, गुस्से में निकल जाता है,
रिश्तों की दीवार में, एक दरार छोड़ जाता है।
घर में गुस्सा और भी होते हैं, पर दोष उनका नहीं,
उनका समय है ये, मेरी तो गलती है यही।

मुझे प्रश्न पूछने का, अब कोई हक नहीं रहा,
गुस्सा करने का भी, अब कोई स्वत्व नहीं रहा।
यदि मैं चिल्ला उठूं, तो समझो मेरी भूल है,
इस ढलती संध्या में, ये मेरा सबसे बड़ा कसूर है।

पता नहीं कब ये, जीवन का दीपक बुझ जाए,
और माफी मांगने का, समय भी हाथ न आए।
इसलिए करबद्ध कहता हूँ, जिन्हें दुख पहुंचाया,
हो सके तो दिल से, मुझे क्षमा कर देना।

कहते हैं स्वभाव नहीं, कभी बदलता इंसान का,
पर मैं कोशिश करूंगा, बदलने की अपनी फितरत का।
बोलने से पहले, खुद को सौ बार टोकूंगा,
शायद इस कोशिश में, अपने को ही मैं साध लूंगा।
— जगदीश प्रसाद शर्मा
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
3 महीने पहले

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