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सद्बुद्धि दो प्रभु

                
                                                         
                            हे परमात्मा, ये जीवन अनमोल वरदान है,
                                                                 
                            
पर विचित्र भंवर में अक्सर भटकता इंसान है।
विषम परिस्थितियों के घेरे जब आ घेरते हैं,
तब बुद्धि भ्रमित होकर राहें भी मोड़ते हैं।

इसलिए करबद्ध विनती, हे दाता सुन लेना,
सद्बुद्धि दो प्रभु, विवेक का दीपक जला देना।
ऐसा विवेक दो, जो हर संकट को समझ सके,
और अंधकार में भी उजले मार्ग को खोज सके।

ऐसी धृति दो, जो डटकर तूफानों से लड़े,
गिरकर भी उठे, और हार को भी गले लगाए।
क्षमाशील बना दो, मन का मैल धो देना,
तेरा हाथ थाम कर, हर पल आनंदित कर देना।

जब विवेक जगेगा, धैर्य साथ चलेगा,
तब हर भंवर भी प्रभु, नदिया बन बहेगा।
जीवन की नैया फिर डोलेगी नहीं कभी,
तेरे नाम की पतवार से पार हो जाएगी तभी।
— जगदीश प्रसाद शर्मा
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
3 महीने पहले

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