"रोटी और रिश्ते"
खून से ही नहीं, परिवार बनता है,
जिम्मेदारी से, सहयोग से सँवरता है।
साथ खड़े रहने से, ये मजबूत होता है,
इसी प्रेम-धागे से, ये रिश्ता बंधता है।
भावनाओं से ही तो, घर नहीं चलता है,
पैसों के बिना, चूल्हा नहीं जलता है।
बच्चों की पढ़ाई, माँ-बाप की दवाई,
अचानक मुसीबत, सब पैसे से टलती है।
पैसा कीमत नहीं, रिश्तों की तय करता,
पर वक्त पर इसकी, अहमियत बता देता।
परिवार के लिए कमाना, स्वार्थ नहीं कहलाता,
ये तो कर्तव्य है, जो हर पुरुष निभाता।
पैसे से आती है, घर में रोटी प्यारी,
पर पैसे से न आती, रिश्तों में गर्माहट सारी।
प्रेम, सम्मान, विश्वास, बाजार में नहीं मिलते,
ये तो सेवा-त्याग से, आँगन में खिलते।
असली समृद्धि वहीं, जहाँ दोनों का मेल है,
रोटी भी है गरम, और रिश्तों में भी तालमेल है।
जेब में हो दौलत, दिल में हो अपनापन,
तभी तो बनता है, सच्चा सुखी जीवन।
- जगदीश प्रसाद शर्मा
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