. "रक्षाबंधन"
श्रावण की पूर्णिमा आई, रेशम की डोर सजी है,
बहन की आँखों में स्नेह, भाई के माथे तिलक सजी है।
इंद्र की रक्षा को इंद्राणी ने, धागा कलाई पर बाँधा था,
देवासुर संग्राम में विजय का, संकल्प उस दिन साधा था।
कृष्ण की उंगली लहू-लुहान थी, द्रौपदी ने पल्लू फाड़ा था,
वचन निभाया मुरलीधर ने, चीर बढ़ाकर लाज बचाया था।
बलि के द्वार पहुँची लक्ष्मी, राखी बाँध हरि को लाई थीं,
स्वार्थ छोड़ प्रभु आए, ये सीख धागे ने सिखलाई थी।
यमुना के प्रेम से पिघले यम, बहन को अमर वरदान दिया,
मृत्यु भी हार गई उस दिन, और रिश्ते ने मान बढ़ा दिया।
धागा नहीं ये रक्षा का, विश्वास का प्रतीक है,
बहन का आशीष, भाई का वचन, यही बंधन की लीक है।
रक्षा का ये पर्व हमें, प्रेम और त्याग सिखाता है,
रक्षासूत्र की डोर में, सारा संसार समाता है।
- जगदीश प्रसाद शर्मा
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