आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

रिश्तों की हैं पाँच सीढ़ियाँ

                
                                                         
                            रिश्तों की हैं पाँच सीढ़ियाँ, सबको ये पता है,
                                                                 
                            
देखना, अच्छा लगना, चाहना, पाना और निभाना।
पहली चार तो मिल जातीं संयोग और चाहत से,
पाँचवी सीढ़ी सबसे ऊँची, सबसे कठिन ठिकाना।

देखना आसान है, नज़रें मिल जाती हैं,
अच्छा लगना आसान, बातें खिल जाती हैं।
चाहना में दिल धड़कता, पाने में खुशी होती,
पर असली परीक्षा तब जब रोज़ की ज़िम्मेदारी होती।

रिश्ते साँस लेते हैं विश्वास की हवा से,
त्याग, धैर्य, सम्मान के जल से सींचा जाता।
संवेदना की डोर से बंधते दो दिल आपस में,
एक-दूसरे के मौन को भी जो समझ ले वही सच्चा।

समय कसौटी बनता, परिस्थिति आकर टकराती,
मतभेद की आँधी में भी जो साथ न छोड़े वही निभाता।
आकर्षण मुरझा जाता, अवसर बदल जाता है,
पर जो हर हाल में थामे, वही रिश्ते की गरिमा पाता है।

बनाना संयोग है, चलाना एक कला है,
प्रेम, विश्वास, व्यवहार की ही सबसे बड़ी माला है।
जो निभाना जान गया वो संस्कारों का दीप है,
उसी के जीवन से दुनिया को रिश्तों की सीख है।

इसलिए सीढ़ी पाँचवी पर पाँव संभाल कर रखना,
मिलना आसान है जगदीश, पर निभाना सीख लेना।
- जगदीश प्रसाद शर्मा
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
2 महीने पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर