"मुक्ति बोध - मैं शरीर नहीं हूँ"
ये हाथ-पैर, ये रोग-व्याधि, ये झुर्रियों की रेखा,
न मैं बूढ़ा हूँ न जवान, न घाव न मरहम देखा।
शस्त्र इसे काट नहीं सकते, अग्नि इसे जला नहीं सकती,
मैं वो हूँ जो देह के भीतर, देह को जिलाती है।
विचारों की भीड़ में उलझा, चिंता की आँधी में बहा,
ईर्ष्या की आग में जला, स्मृति के बोझ में सहा।
पर मैं विचार नहीं, मैं विचारों को देखने वाला,
मन की लहर हूँ नहीं, मैं सागर का किनारा।
मोह में बंधा, अपेक्षा में टूटा, अकेलेपन में रोया,
किसी के आने पर हर्षाया, किसी के जाने पर खोया।
पर न कोई मेरा, न मैं किसी का, सब आते-जाते मेहमान,
संबंधों का साक्षी हूँ मैं, संबंध स्वयं नहीं पहचान।
सेवा की, समर्पण किया, फल की इच्छा भी त्यागी,
33 बरस पढ़ाया, पर "मैंने पढ़ाया" भाव को भी त्यागा।
कर्म किया पर कर्ता न बना, नदिया सी बहता गया,
जो होना था वो हुआ, मैं तो बस निमित्त बना रहा।
अब न देह, न मन, न नाम, न कोई पहचान बाकी,
बचा तो बस वो प्रकाश, जो हर अंधेरे में झाँकी।
मैं साक्षी हूँ सबका, मैं ही सबमें समाया,
"मैं शरीर नहीं हूँ" — ये बोध ही मुक्ति का आया।
-जगदीश प्रसाद शर्मा
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
कमेंट
कमेंट X