बाहर आँधी-तूफाँ हो, या हो सावन-धूप,
मन भीतर शांत रहे तो, सब लगता है खूब।
बाहर का मौसम बदले, क्या लेना-देना,
भीतर का मौसम अच्छा, तो सब कुछ है अपना।।
मत खोज मेरी कमजोरी, ओ मेरे मीत,
तू भी तो शामिल है, मेरी हर जीत-हार-रीत।
तेरे बिना मैं अधूरा, तू भी तो हिस्सा मेरा,
तू ही आईना मेरा, तू ही तो किस्सा मेरा।।
नियत अच्छी रखो, चाहे दुनिया दिखावा देखे,
दुनिया तो रंगों से, बस चेहरे को लेखे।
दिखावा कितना भी चमके, हीरा न कहलाए,
ईश्वर तो नियत देखे, दिखावा वहाँ न जाए।।
मनुष्य न मौसम, न है तापमान कोई,
फिर भी पल-पल बदले, ये कैसी बात हुई?
आज जो अपना लगता, कल पराया हो जाए,
मन का क्या भरोसा, कब बदल जाए।।
मन शब्द बड़ा जादू, देखो इसका खेल,
आगे 'न' लगे तो बने 'नमन', करे मेल।
पीछे 'न' लगे तो बने 'मनन', गहरा ज्ञान,
नमन-मनन करते रहो, होगा समस्या-दान।।
दो ममताओं की देखो, कितनी सुंदर रीत,
माँ कहे आज न भूखा रहे, ये है उसकी प्रीत।
पिता सोचे कल का, कि कल भूखा न रहे,
दोनों का दर्जा ईश्वर-सा, वेद यही कहे।।
सच है इस दुनिया में, कड़वी पर सच्ची बात,
माँ-बाप बिना कोई न चाहे, तेरी औकात।
सब जलते हैं तरक्की से, मन में रखते बैर,
बाप ही है जो चाहे, बेटा जाए उससे भी आगे पैर।।
भाग्यशाली वो नहीं, जिसे सब अच्छा मिल जाए,
भाग्यशाली तो वो है, जो मिले को अच्छा बनाए।
पत्थर में भी राह बना ले, काँटों में फूल खिलाए,
जो है उसी में खुश रहे, वही मुकुट पहन जाए।।
सराहना दिल से करना, दिमाग से टोकना,
विवेक से समीक्षा करना, यही है सीखना।
वरना इन तीनों में यदि एक भी चूके,
तो बेहतर है मौन रहो, नहीं तो रिश्ते रूठे।।
- जगदीश प्रसाद शर्मा
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