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कर्म की गवाही

                
                                                         
                            सबसे बड़ा भ्रम ये है, लोग हमें यूं समझेंगे,
                                                                 
                            
जैसे हमने कहा है, वैसे ही वो सुन लेंगे।

पर सच ये है जग में, हर कोई अपने ढंग से सुनता,
अपने अनुभव, अपने पूर्वाग्रह का चश्मा पहनता।

कोई भावों से तोले, कोई स्वार्थ से तौले,
शब्दों का अर्थ बदल कर, फिर दूसरों को बोले।

"मैंने ये कहा था" — इसका सबूत क्या होगा?
हवा में बोले शब्द, किसके पास ठहरेंगे?

इसलिए अपेक्षा छोड़ो, कि हर कोई समझेगा,
बात को तोड़-मरोड़ कर, कोई और ही कहेगा।

बेहतर है तुम अपना, चरित्र शीशे सा रखो,
व्यवहार को आईना बनाओ, कर्मों को सच्चा रखो।

क्योंकि शब्द तो बदलते, अर्थ उनके फिरते,
पर सच्चे कर्मों की गवाही, समय खुद ही लिखते।

धूप कितनी तेज़ हो, छाँव झूठ नहीं बोलती,
दीया कितना छोटा हो, अंधेरा नहीं डोलती।

लोग आज न समझें तो, कल समय समझाएगा,
तुम्हारे काम खुद बोलेंगे, सच सबको दिखलाएगा।

इसलिए बोल कम करो, और करके दिखलाओ,
चरित्र की स्याही से ही, जीवन की कथा बनाओ।

याद रखो — शब्द बह जाते हैं, कर्म पत्थर पर लिखते हैं,
और वही पत्थर एक दिन, तुम्हारी सच्चाई सिद्ध करते हैं।

सार एक ही है:
बोलने से नहीं, जीने से प्रमाण मिलता है।

- जगदीश प्रसाद शर्मा, दिल्ली
स्वरचित मौलिक रचना
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
2 महीने पहले

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