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जीवन का शिल्पी

                
                                                         
                            "जीवन का शिल्पी"
                                                                 
                            

पहला शिल्पी माँ होती है, गोदी में आकार देती,
लोरी से संस्कार बोती, धैर्य की नींव धरती।

दूसरा शिल्पी पिता बनता, अनुशासन की छाँव,
गिरकर संभलना सिखाता, बनाता कर्तव्य का पाँव।

किशोर हुआ तो गुरु आया, ज्ञान की मशाल जलाई,
"तू क्या है" ये बताकर, भीतर की ज्योति जगाई।

गुरु न मिले श्रेष्ठ अगर, तो संगत असर दिखाती,
मित्रों की मंडली ही, दिशा को नई बनाती।

फिर समाज का रंग चढ़ा, रिश्ते-नाते-व्यवहार,
ठोकर खाकर सीखा जब, तब पका व्यक्तित्व सार।

कोई कहे ब्रह्मा ने गढ़ा, कोई कहे विष्णु ने पाला,
कोई कहे पूर्व जन्मों का, संस्कार साथ में चला।

पर सच ये है जीवन का, शिल्पी कोई एक नहीं,
माँ-पिता-गुरु-समाज-संगत, सबका हाथ है कहीं।

शरीर तो मिट्टी का ढांचा, शिल्पी बनाते इसको,
कर्म की छेनी-हथौड़ी से, आदर्श में ढालते इसको।

सार यही है:
जिसने सीखा तराशना खुद को, वही असली शिल्पकार,
ईश्वर ने दिया पत्थर बस, मूर्ति बनाना है हम पर।
- जगदीश प्रसाद शर्मा
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
3 महीने पहले

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