आदर्श की बातें दुनिया बहुत करती है,
पर सच जेब की गहराई से ही परखती है।
पुरुष का मान चरित्र से नहीं नापा जाता,
उसका वजूद नोटों से ही गिना जाता है।
बिना पैसे के साथ कोई अपना नहीं होता,
रिश्तों का ढांचा भी 'पेइंग कैपेसिटी' पर टिका होता।
परिवार पास खड़ा तब लगता है,
जब खर्चे की ताकत साथ चलती है।
गरीब पुरुष की कोई निजी ज़िंदगी नहीं,
सुबह से रात बस मशीन-सा पसीना ही।
दुनिया उसे इंसान का भ्रम देती है,
बदले में उससे सिर्फ काम ही लेती है।
आदर चाहिए तो जेब में दम चाहिए,
प्रेम चाहिए तो हाथ में रकम चाहिए।
बात रखने का हक भी पैसों से मिलता है,
खामोश रहना गरीबी का ही दस्तूर चलता है।
कड़वा है पर यही आज का सच है,
बिना धन के पुरुष का कोई वजूद नहीं।
इसलिए उठें, मेहनत को हथियार बनाएं,
जेब भरें, ताकि दुनिया भी इज्जत से बुलाएं।
— जगदीश प्रसाद शर्मा
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