आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

जेब का वजूद

                
                                                         
                            आदर्श की बातें दुनिया बहुत करती है,
                                                                 
                            
पर सच जेब की गहराई से ही परखती है।
पुरुष का मान चरित्र से नहीं नापा जाता,
उसका वजूद नोटों से ही गिना जाता है।

बिना पैसे के साथ कोई अपना नहीं होता,
रिश्तों का ढांचा भी 'पेइंग कैपेसिटी' पर टिका होता।
परिवार पास खड़ा तब लगता है,
जब खर्चे की ताकत साथ चलती है।

गरीब पुरुष की कोई निजी ज़िंदगी नहीं,
सुबह से रात बस मशीन-सा पसीना ही।
दुनिया उसे इंसान का भ्रम देती है,
बदले में उससे सिर्फ काम ही लेती है।

आदर चाहिए तो जेब में दम चाहिए,
प्रेम चाहिए तो हाथ में रकम चाहिए।
बात रखने का हक भी पैसों से मिलता है,
खामोश रहना गरीबी का ही दस्तूर चलता है।

कड़वा है पर यही आज का सच है,
बिना धन के पुरुष का कोई वजूद नहीं।
इसलिए उठें, मेहनत को हथियार बनाएं,
जेब भरें, ताकि दुनिया भी इज्जत से बुलाएं।
— जगदीश प्रसाद शर्मा
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
3 महीने पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर