"इदं न मम"
त्यज् धातु से त्याग बना है, छोड़ना ही सार है,
वेदों ने कहा तीन रूपों में, यही तो त्याग-धार है।
पहला त्याग है बुराई को मन से छोड़ देना,
दूसरा दान है परहित में अपना दे देना,
तीसरा वैराग्य है भोगों से मुक्त हो जाना,
यही तो है सच्चे जीवन का हो जाना।
यजुर्वेद ने ईशावास्य में यही सिखाया है,
तेन त्यक्तेन भुञ्जीथाः यही गाया है।
जो कुछ है जगत में, सब तेरा ही है,
त्याग-भाव से भोग, लोभ न तेरा ही है।
हे पिता, मुझे ऐसी प्रेरणा और बल दो,
त्याग-भाव से जीने का संबल दो।
अभिमान त्याग दूँ, मैं कर्ता नहीं हूँ,
हर वस्तु को तेरा प्रसाद कहता हूँ।
भोग-वृत्ति मिटे, प्रसाद-भाव आए,
मैं मिटूँ और तू ही तू समाए।
अविद्या त्याग दूँ, अंधकार छूटे,
पाखंड, अंधविश्वास का जाल टूटे।
तेरे सत्य स्वरूप को पहचान सकूँ,
ज्ञान के दीप से जग को जान सकूँ।
असत्य त्याग दूँ, छल-कपट जाए,
सत्य, धर्म, न्याय में मन रम जाए।
झूठ की डोर से मुक्त हो जाऊँ,
सत्य पथ पर ही दृढ़ हो जाऊँ।
आलस्य, प्रमाद को त्याग सकूँ,
अकर्मण्यता से मुक्त हो जी सकूँ।
जीवन को यज्ञ बना पाऊँ,
परोपकार में ही रम जाऊँ।
अन्याय के धन का त्याग करूँ,
पाप-कमाई से दूर रहूँ।
श्रेष्ठ धन, यश, कीर्ति कमाऊँ,
तेरे ही मार्ग पर चलता जाऊँ।
हे प्रभु मेरी विनय सुन लो,
हृदय में इदं न मम गुन लो।
इदं न मम - मैं मिटा,
इदं न मम - मेरा मिटा,
खाली घट में तू भरा,
अब मैं नहीं, मेरा नहीं,
बस तू मिला, बस तू मिला,
तू ही तू, तू ही तू।
- जगदीश प्रसाद शर्मा
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