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हे सूर्य-सम प्रभु

                
                                                         
                            हे परमात्मा, सूर्य-से तुम अनुपम रचना हो,
                                                                 
                            
अंधकार चीरकर जग को नव जीवन देते हो।
जैसे किरणों से भरते हो धरा में तेज और बल,
वैसे मन के तम को हरकर, दो ज्ञान का संबल।

अज्ञान, आलस्य, रोग और संशय मिटा दीजिए,
हृदय के कोने-कोने से भय को दूर भगा दीजिए।
जैसे बिना भेदभाव के, सब पर दृष्टि रखते हो,
वैसे समता, करुणा, दया का भाव हममें भर दीजिए।

बुद्धि में दीजो प्रज्ञा, चित्त में तेज जगाइए,
कर्मों में उन्नति, विचारों में समृद्धि लाइए।
मन को दीजो सुख-शांति, चरणों में शरण दीजिए,
आत्मा में भरकर दिव्यता, कृतार्थ हमें कीजिए।

जिस तरह सूर्य अकेला, सबको प्रकाशित करता है,
वैसे हम भी जग की सेवा में निःस्वार्थ बहते रहें।
तम से लड़ें, सत्य जिएं, यही प्रार्थना स्वीकार हो,
हे प्रभु, कृपा की किरण से जीवन साकार हो।
— जगदीश प्रसाद शर्मा
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
3 महीने पहले

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