"हे संपूर्ण!"
हे ईश्वर! हर भोर तेरे द्वार पर आते हैं,
क्योंकि हम अधूरे हैं, और तू ही संपूर्ण कहाते हैं।
मांगें और किससे हम? दाता तू ही एक है,
देने वाला, पालने वाला, सबका विवेक है।
हे प्रभु! हमें संयम का दान दे दो,
अंतर में संयम की ज्योति जला दो।
मानसिक संयम दे, मन भटके ना,
चिंता, ईर्ष्या, घृणा का तूफान उठे ना।
विचार निर्मल हों, चित्त शांत रहे,
तेरे नाम की धुन में जीवन बहे।
वाचिक संयम दे, वाणी पवित्र हो,
झूठ, चुगली, निंदा से ये दूर रहो।
जो बोले मुख से, वो सत्य ही हो,
हर शब्द में करुणा और अमृत ही हो।
ऐन्द्रिय संयम दे, इंद्रियां बस में हों,
चंचल चपलता से ये आँखें नम हों।
जो देखे वो सुंदर, जो सुने वो भला,
विषयों के जाल में मन ना फंसा।
शारीरिक संयम दे, तन आलस त्यागे,
विलास-वासना के बंधन ना लागे।
कर्म की शक्ति से ये देह सजे,
सेवा के पथ पर ये कदम बढ़े।
आर्थिक संयम दे, लोभ ना सताए,
संग्रह की दौड़ में नीति ना खो जाए।
रिश्वत के हाथ कभी ना बढ़े,
संतोष के धन से घर-आंगन बढ़े।
हे पूर्ण! हमारे सब दोष मिटा दो,
हमें कल्याण के पथ पर लगा दो।
'मैं' को मिटाकर 'तू' में मिला दो,
जीवन को तेरा प्रसाद बना दो।
'जगदीश' शीश झुका कर मांगें यही,
संयम, शांति, और तेरा साथ रहे सदा ही।
- जगदीश प्रसाद शर्मा
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