रोटी कमाने वाला दिनभर मेहनत से हारा है,
रोटी बनाने वाला प्रेम से घर को संवारा है।
दोनों थकते हैं, दोनों का पसीना बहता है,
तुलना की तराजू यहाँ किस काम आती है?
कोई बाहर की जिम्मेदारी कंधे पर ढोता है,
कोई चूल्हे-चौके में अपनापन जोड़ता है।
एक की दौड़ से घर का खर्चा चलता है,
दूसरे की ममता से घर में चैन पलता है।
हिसाब लगाओगे तो रिश्ते कमजोर होंगे,
इज्जत दोगे तो बंधन और मज़बूत होंगे।
काम छोटा-बड़ा नहीं, नीयत बड़ी होती है,
दोनों के बिना गृहस्थी आधी-अधूरी होती है।
जहाँ सम्मान की बोली, समझ की बात होती है,
वहीं घर में सुख की बरसात होती है।
प्रेम की नींव पर जो परिवार खड़ा होता है,
वहीं असली अपनापन हर कोने में दिखता है।
- जगदीश प्रसाद शर्मा
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