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धुंध.....

                
                                                         
                            धुंध.....
                                                                 
                            

ज़िंदगी का यही सबसे पुराना अफसाना है,
कि हम एक धुंध से उतरकर इस संसार में आए हैं।
न कोई नाम था, न कोई रूप, न कोई पहचान,
बस चेतना की एक लौ थी, जो धुंध को चीरकर आई थी।

और एक दिन फिर उसी धुंध में हमें चले जाना है,
जहाँ देह छूटेगी, नाम मिटेगा, रिश्ते गल जाएंगे।
बीच का सारा सफर बस इसी धुंध को साफ करने का है,
कि कौन आया, क्यों आया, और किसे लौटकर जाना है।

आँखें हैं, पर देख नहीं पातीं इस धुंध के पार,
कान हैं, पर सुन नहीं पाते उस मौन की पुकार।
मन विचारों के बादल बनकर हर सत्य को ढक देता है,
और हम उसी बादल को ही आकाश समझ बैठते हैं।

जो इस धुंध के पार झाँक ले, वही महात्मा कहलाता है,
जिसने इस धुंध को हटा कर ज्योति देख ली, वही ज्ञानी कहलाता है।
और जो इस धुंध को रचता है, पालता है, और समेट लेता है,
उसी अनाम शक्ति को हम परमात्मा कहते हैं।

मैं न देह हूँ जो धुंध में उलझी है,
न मन हूँ जो धुंध से डरता है।
मैं तो वह साक्षी हूँ जो धुंध को भी देख रहा है,
और धुंध के हटने की प्रतीक्षा भी कर रहा है।
मैं शरीर नहीं हूँ, मैं उस प्रकाश का अंश हूँ,
जो धुंध से पहले था, और धुंध के बाद भी रहेगा।
- जगदीश प्रसाद शर्मा
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
2 महीने पहले

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