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बिंदु बन सके

                
                                                         
                            "बिंदु बन सके"
                                                                 
                            

हे ईश्वर तुम संपूर्ण हो, संपूर्ण ये संसार,
अपने भीतर धारण करते सृष्टि का विस्तार।
तुम्हारे अटल नियम से ही चलता ये चक्र है,
रचना, पालन, संहार का तू ही तो केंद्र है।

प्रभु हम सब तुम्हारी ही संतान कहाते हैं,
पुत्र-पुत्रियाँ बनकर तेरे द्वार पर आते हैं।
देना हमें ऐसी बुद्धि, साहस और धीरज,
जिससे हम सह सकें जीवन के हर तूफां और भंवर।

देना तेज और वो बल जो सत्य की राह दिखाए,
जिससे कर्तव्य के पथ पर हम डगमग न हो पाए।
तेरी वेद वाणी का हम अमृत पान कर सकें,
हर शब्द में छुपे ज्ञान की पहचान कर सकें।

तेरे नियम, तेरी आज्ञा को समझ धारण करें,
मन-वचन-कर्म से उनका हम अनुसरण करें।
अहंकार मिट जाए और विनय का भाव जागे,
तब कहीं जाकर तेरे अंश में हमारा नाम लागे।

हम नहीं मांगते कुछ बड़ा, ना कोई वरदान,
बस तेरे विराट स्वरूप का एक छोटा सा बिंदु बन जाएं।
जहाँ तेरा प्रकाश हो, वहीं हमारा जीवन हो,
तेरी इच्छा में ही हमारी हर पहचान हो।
- जगदीश प्रसाद शर्मा
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
2 महीने पहले

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