"अभी, यहीं मुक्त है तू"
नहीं जप-तप चाहिए, न कठिन विधान है,
मुक्ति दूर नहीं, यह तो तेरा ज्ञान है।
पहले ही श्लोक में, ऋषि ने पुकारा,
तू बद्ध नहीं है, तू है मुक्त सारा।।
कर्मकांड के फेरे में, क्यों भटकता है,
मुक्त होकर भी, बंधन गढ़ता है।
शरीर नहीं तू, न तू अहंकार है,
तू तो साक्षात् चेतना, तू निराकार है।।
कल नहीं, आज नहीं, अभी जान ले,
अपने को देह से, भिन्न मान ले।
जैसे ही जानेगा, तू है चैतन्य महान,
उसी क्षण टूटेगा, सारा भ्रम-गुमान।।
साधना का सोपान, बाद में आता है,
ज्ञान तो बिजली सा, एक क्षण में आता है।
अष्टावक्र बोले - जनक, तू मुक्त ही तो है,
बस इस सत्य को, अभी जानना ही तो है।।
- जगदीश प्रसाद
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