"अभय पद"
हे परमात्मा! मुझे अभय कर दो,
बाहर का भय, भीतर का भय, हर भय हर लो।
मृत्यु का भय, जीवन का भय, संशय सब मिट जाए,
दसों दिशाओं में प्रभु, तेरा ही अभय छा जाए।
आगे अभय, पीछे अभय, ऊपर-नीचे तू ही तू,
मित्रों में अभय, शत्रुओं में, ज्ञात-अज्ञात में तू ही तू।
अंग-संग हो जाओ प्रभु, अपनी शरण में ले लो,
अपने अभय पद पर मुझे, एक बार स्थान दे दो।
तुम ही सत्य, तुम ही गति, तुम ही मेरी डोर,
तुम बिन मेरा कुछ नहीं, तुम ही अंतिम छोर।
जैसे नदियाँ सागर में, अपना नाम मिटा देती,
वैसे ही मैं तुममें मिल, अपना "मैं" खो देना चाहती।
अब न भय है, न संशय है, केवल तुम ही तुम,
तुम्हीं में आसक्ति जगे, और कुछ न सूझे मन।
दिल में तुम, दिमाग में तुम, चित्त-मन-चित्त में तुम,
जैसे रखो वैसे रहूँ, मुझमें बस तुम ही तुम।
--- जगदीश प्रसाद शर्मा
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