सूरज अपनी रोशनी उस पर डालता क्यों है?
चाँद! तेरे पास कुछ नहीं, फिर इतराता क्यों है?
समंदर किनारे थी मेरी छोटी-सी झोपड़ी,
रोज़ लहरों को मेरी तरफ़ उछालता क्यों है?
अपने ही कुत्ते को पत्थर से मार रहा है ज़ालिम,
इतनी ही नफ़रत है, तो फिर उसे पालता क्यों है?
परिंदे आसमाँ में होंगे या शाखों पर बैठे होंगे,
घर का एक-एक कोना यूँ खँगालता क्यों है?
मयख़ाने में तू मिला था, हाथ में जाम लिए,
होश बेचकर फिर होश सँभालता क्यों है?
ख़ुद अपने पाँव के नीचे ज़मीन बची नहीं,
दूसरों के रास्तों में कीलें बिछाता क्यों है?
आईना झूठ नहीं बोलता, ये ख़बर है तुझे,
हाथ में उठाकर बार-बार आईना देखता क्यों है?
'जगदीश' हर शख़्स अपने ही बोझ से टूटा है,
तू गैर के कंधों पर बोझ डालता क्यों है?
-जगदीश चंद्र कापड़ी
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