जब सच को सफ़ाई देनी पड़े
और झूठ बिना गवाही के बरी हो जाए,
समझ लेना,
समाज आईना नहीं,
चेहरों का बाज़ार बन चुका है।
जब भूख से बड़ी बहसें होने लगें,
और रोटी से ज़्यादा नारे बिकने लगें,
समझ लेना,
ज़मीर की ज़मीन
बंजर होने लगी है।
जब ईमान का मूल्य
पद, पैसा और पहचान से
तय होने लगे,
और चरित्र का कद
तालियों की गिनती से
मापा जाने लगे,
समझ लेना,
सभ्यता कपड़े बदल रही है,
संस्कार नहीं।
जब किताबों से ज़्यादा
अफ़वाहों पर भरोसा होने लगे,
और सवाल पूछने वाला ही
कटघरे में खड़ा कर दिया जाए,
समझ लेना,
अँधेरा सिर्फ़ रात में नहीं उतरता।
जब रोटी से बड़ी राजनीति हो जाए,
और इंसान से बड़ा उसका धर्म हो जाए,
समझ लेना,
समाज अपनी ही परछाई से
डरने लगा है।
जब न्याय की आँखों पर
पट्टी नहीं, परदे डाल दिए जाएँ,
और अपराधी से ज़्यादा
गवाहों को डराया जाने लगे,
समझ लेना,
कानून नहीं, गुंडई का राज हो रहा है।
जब कलम से ज़्यादा
तलवारों की इज़्ज़त होने लगे,
और सवाल पूछने वाला,
बंदूक के निशाने पर हो,
समझ लेना,
विचारों की आज़ादी पर
पहरा बैठ चुका है।
जब बच्चों को
सपनों से पहले डर सिखाया जाए,
और बुज़ुर्गों को
सम्मान से पहले अकेलापन मिले,
समझ लेना,
समाज अपनी जड़ों से कटने लगा है।
फिर भी उम्मीद बची रहती है,
क्योंकि हर दौर में
कुछ कलमें बिकती नहीं,
कुछ ज़मीर झुकते नहीं,
कुछ लोग तालियों के लिए नहीं,
सच के लिए खड़े होते हैं।
वक़्त बदलता है,
तख़्त बदलते हैं,
चेहरे बदलते हैं,
लेकिन इतिहास हमेशा
उन लोगों को याद रखता है
जो भीड़ की दिशा में नहीं,
मानवता की दिशा में चलते हैं।
रवायतें बदलना आसान नहीं होता,
लेकिन हर नई सुबह
किसी एक ऐसे इंसान से शुरू होती है
जो यह कहने का साहस रखता है—
"इंसानियत,
हर रवायत से बड़ी है।"
-जगदीश चंद्र कापड़ी
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