मेरा हर अश्क आँखों से निकलता नहीं,
मैं काजल लगा लूँ, मगर चेहरा बदलता नहीं।
खड़ा हो जाता हूँ जब आईने के सामने,
मेरा सच मेरी नजरों से उतरता नहीं।
टूटकर बिखर गया बुलंदियों का सारा नशा,
मगर उम्मीद का जज़्बा कभी पिघलता नहीं।
मुझे बड़ा पेचीदा लगता है तुझे समझना,
तू जानता सब कुछ है, मगर बोलता नहीं।
अपने वजूद का सौदा तूने सरे बाज़ार किया,
और कहता है कि "मैं किरदार बदलता नहीं"
चराग़ों को बुझाने की फ़िक्र में है ये दुनिया,
सूरज का मिजाज है, वो कभी पिघलता नहीं।
'जगदीश' कलम मेरी सलामत है, मैं ज़िंदा हूँ,
कलमकार किसी दरबार में पलता नहीं।
-जगदीश चन्द्र कापड़ी
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