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आस-पास

                
                                                         
                            मैं अपने ढूँढ़ता रहा, अपने आस-पास,
                                                                 
                            
छिपे थे चेहरे, नकाब पहने आस-पास।

रिश्ते तो बहुत मिले इस सफ़र में मगर,
कोई अपना न मिला मेरे आस-पास।

पुकारा जिसको भी दुनिया की भीड़ में,
ख़बर ही न थी—बहरे थे मेरे आस-पास।

और सबसे बड़ा दर्द यही रहा उम्र भर,
मैं ख़ुद भी नहीं था कभी अपने आस-पास।

तुम इंसान हो, तो मुझे इंसान समझो,
दर्द बराबर है—मेरे या तेरे आस-पास।
— जगदीश चन्द्र कापड़ी
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2 घंटे पहले

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