तम हर लेता है वो, ज्ञान राशि देता है वो, जगत उसे गुरु व शिक्षक पुकारता।
कभी वो कुम्हार बन, पीटता है कुंभ तन, दोष एक एक हर छात्र को सँवारता।
पुस्तकों से रखे नाता, ज्ञान को सदा बढ़ाता, उन हीं में अपना वो जीवन गुजारता।
मान ही कमाता है वो, और क्या ही पाता है वो, इसी को नियति मान बात उर धारता।
-इन्द्र प्रसाद 'रत्नेश'
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
कमेंट
कमेंट X