घन घोर उठे नभ में चहुँ ओर बहै पुरवा मन भावन की।
मन आगि लगी तन शीतलता सुनिकै बतिया पिय आवन की।
सखियाँ सिगरी जब आइ गईं सब बात कहैं समझावन की।
अब धीर धरै नहिं चैन परै नहिं आगि हवै यह सावन की।
-इन्द्र प्रसाद 'रत्नेश'
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