मोहन ग्वालन बालन के सँग जाइ कबौ मिलि गाय चरावत।
फोड़त हैं मटकी कबहूँ कबहूँ घर माखन जाय चुरावत।
डार कदंबन बैठि कबौ सबके सँग में मिलि बेनु बजावत।
सूरज की तनया तट पै कबहूँ सब गोपिन नाच नचावत।
-इन्द्र प्रसाद 'रत्नेश'
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
कमेंट
कमेंट X