लघुता बिसराय दियौ मन से यहु भाव विनाश करै नर का।
सब संतति हैं वहि ईश्वर की मन भाव नहीं भरिए डर का।
दुइ हाथ व पैर मिले हमको सबको तरना भव सागर का।
हर एक यहाँ पर भिन्न हवै मत शोक करो सरसों भर का।
-इन्द्र प्रसाद 'रत्नेश'
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