इच्छा एक चुनाव की, नहीं हृदय में और।
बातन माहिं विकास है, जरा कीजिए गौर।।१॥
हिंदू सारा एक हो, कहे एक ही बात।
इच्छा सी. यम. की तजो, बहुत किए आघात।।२॥
छल प्रपंच को छोड़कर, करो सत्य का साथ।
इच्छा सच्चे हृदय की, पूर्ण करैं रघुनाथ।।३॥
तन मरता इच्छा नहीं, ये हैं कोटि अनंत।
इक पूरी दूसरि बनी, ज्ञानी यही वदंत।।४॥
इच्छा शिक्षा की रखौ, जौ चाहत कल्यान।
जिहिमा है शिक्षा नहीं, वहिका भीख निदान।।५॥
इच्छा मेरी है यही, करूँ सदा सत्कर्म।
शब्द जटिल हों या सरल, समझूँ उनका मर्म।।६॥
-इन्द्र प्रसाद 'रत्नेश'
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